Friday, January 31, 2020

सामाजिक न्याय 

निमोनिया के कारण मोते 
  • UNICEF, निमोनिया रोग
  • बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे, सरकार द्वारा स्वास्थ्य की दिशा में उठाए गए कदम

  • संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (United Nations Children's Fund- UNICEF) के हालिया अध्ययन के अनुसार, भारत में वार्षिक तौर पर होने वाली पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की कुल मृत्यु में से 14% मृत्यु का कारण निमोनिया (Pneumonia) होता है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • भारत में वार्षिक तौर पर 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु में 14% या लगभग 1,27,000 मौतों का कारण निमोनिया है। ध्यातव्य है कि वर्ष 2013 में यह आँकड़ा लगभग 1,78,000 था। इनमें से आधे से अधिक मौतें देश के उत्तरी भाग में होती हैं।
  • निमोनिया के कारण वर्तमान मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर पाँच है और इसे वर्ष 2025 तक तीन से कम करने का लक्ष्य है।
  • UNICEF के अनुसार, निमोनिया बच्चों के लिये सबसे बड़ा खतरा है। वैश्विक स्तर पर यह 1,53,000 से अधिक नवजात शिशुओं सहित हर वर्ष पाँच वर्ष से कम उम्र के 8,00,000 से अधिक संक्रमित बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है। अर्थात् हर 39 सेकंड में एक बच्चा निमोनिया के कारण मर जाता है।
  • अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में निमोनिया से अत्यधिक मौतें होती हैं जिसमें डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, इथियोपिया, भारत, नाइजीरिया और पाकिस्तान शामिल हैं। ध्यातव्य है कि निमोनिया के कारण होने वाली कुल मौतों में लगभग आधी मौतें इन पाँच देशों में होती हैं।

निमोनिया के लक्षण:

  • चूँकि निमोनिया फेफड़ों का संक्रमण है, इसलिये इसके सबसे आम लक्षण खाँसी, साँस लेने में परेशानी और बुखार हैं।
  • निमोनिया से पीड़ित बच्चों में तेज साँस लेने संबंधी लक्षण पाए जाते हैं।

क्या निमोनिया संक्रामक रोग है?

  • निमोनिया एक संक्रामक रोग है और वायुजनित कणों (खाँसी या छींक) के माध्यम से फैल सकता है।
  • यह अन्य तरल पदार्थों जैसे बच्चे के जन्म के दौरान रक्त या दूषित सतह के माध्यम से भी फैल सकता है।

निमोनिया के कारण:

  • निमोनिया से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं:
    • कुपोषण
    • टीकों और एंटीबायोटिक्स की पहुँच में कमी
    • वायु प्रदूषण
  • इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (The Institute for Health Metrics and Evaluation) के एक अध्ययन के अनुसार, निमोनिया के प्रमुख कारणों में वायु प्रदूषण का योगदान लगभग 17.5 प्रतिशत है।
  • खाना पकाने के ठोस ईंधन के उपयोग से होने वाले प्रदूषण के कारण लगभग 1,95,000 (या कुल मौतों का 29.4 प्रतिशत) मौतें होती हैं।

निमोनिया की रोकथाम के उपाय

  • पर्याप्त पोषण जैसे सुरक्षात्मक उपायों को बढ़ाकर और वायु प्रदूषण (जो फेफड़ों को संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है) तथा अच्छी स्वच्छता प्रथाओं का उपयोग करके जोखिम वाले कारकों को कम किया जा सकता है।
  • अध्ययनों से पता चला है कि यदि साबुन से हाथ धोया जाए तो बैक्टीरिया के संपर्क में आने से होने वाले निमोनिया के खतरे को 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
  • निमोनिया का इलाज करने के लिये स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं की परिवारों तक आसान पहुँच, सही प्रशिक्षण, दवाओं और नैदानिक ​​उपकरणों का होना आवश्यक है।
  • रोकथाम और उपचार दोनों के लिये मज़बूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के साथ-साथ संलग्न एवं सशक्त समुदायों की आवश्यकता होती है। लेकिन विश्व स्तर पर निमोनिया से पीड़ित केवल 68 प्रतिशत बच्चे ही स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता के पास पहुँच पाते हैं।

Note : 

  • देश में बुनियादी स्वास्थ्य ढाँचे को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है, साथ ही देशवासियों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की भी आवश्यकता है।
  • ध्यातव्य है कि निमोनिया के उपचार और रोकथाम हेतु सेवाओं को बढ़ाकर दुनिया भर में पाँच वर्ष से कम उम्र के 3.2 मिलियन बच्चों की जान बचाई जा सकती है।
  • इससे एक लहर प्रभाव (Ripple Effect) भी निर्मित होगा जिससे अन्य प्रमुख बचपन की बीमारियों से 5.7 मिलियन अतिरिक्त बच्चों की मृत्यु को रोका जा सकेगा और साथ ही एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता को कम किया जा सकेगा।

अंतर्राष्ट्रीय चिंता संबंधी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल 
  • अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल

  • अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने का कारण
Why is this topic so important ?

हाल ही में कोरोनावायरस (Coronavirus) के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार के जोखिम को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation- WHO) ने ‘अंतर्राष्ट्रीय चिंता संबंधी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ (Public Health Emergency of International Concern- PHEIC) लागू करने की घोषणा की है।

मुख्य बिंदु:

  • WHO के अनुसार, यह वायरस कमज़ोर स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली वाले देशों में सर्वाधिक प्रभावी हो सकता है।
  • WHO के अनुसार, जर्मनी, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और वियतनाम सहित 18 अन्य देशों में कोरोनावायरस संक्रमण के 82 मामलों की पुष्टि की गई है।

अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने के कारण:

  • चीन से प्रसारित कोरोनावायरस दुनिया के कई देशों में दस्तक दे रहा है, अकेले चीन में ही इस वायरस से मरने वाले लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढती जा रही है।
  • चीन में 7,700 से अधिक व्यक्ति इस वायरस से संक्रमित हुए हैं जिनमें से लगभग 170 व्यक्तियों की मौत हो चुकी है।
  • पूरे विश्व में कोरोनावायरस से संक्रमित लगभग 8,200 से अधिक मरीज़ हैं, जिसे देखते हुए कोरोनावायरस को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया जाना चाहिये।

अन्य वायरस जिनके संबंध में लागू हुआ अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल:

  • WHO ने वर्ष 2007 में अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल से संबंधित कानून के प्रभावी होने के बाद से पाँच बार सार्वजनिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल लागू किया है।
  • इससे पहले स्वाइन फ्लू (Swine Flu), पोलियो (Polio), ज़ीका (Zika) के संबंध में एक-एक बार तथा इबोला (Ebola) के संक्रमण के संबंध में दो बार आपातकाल लगाया जा चुका है।

क्या है अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल?

  • कुछ गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य घटनाएँ जिनसे अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न होता है और ऐसी आपात स्थितियों के नियमन के लिये WHO द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल लागू किया जाता है।
  • WHO अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल के लिये ‘अंतर्राष्ट्रीय चिंता संबंधी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ (Public Health Emergencies of International Concern- PHEIC) नामक पद का प्रयोग करता है।
  • PHEIC को अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमन, 2005 (International Health Regulations- IHR)मेंएक असाधारण घटना के रूप में परिभाषित किया गया है जो निम्नलिखित स्थितियों पर विनियमों के उद्देश्य से लगाया जाता है-
    • रोग के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार से अन्य देशों के लिये एक सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होना।
    • ऐसी स्थिति जो कि गंभीर, असामान्य या अप्रत्याशित हो तथा जिसका संक्रमण प्रभावित राज्य की राष्ट्रीय सीमा से परे हो और जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये खतरा उत्पन्न कर दिया हो तथा ऐसी स्थिति के लिये तत्काल अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई की आवश्यकता हो।

कैसे होता है आपात स्थिति का निर्धारण?

  • आपात स्थिति निर्धारित करने की ज़िम्मेदारी WHO महानिदेशक की होती है, ऐसी स्थिति के निर्धारण के लिये विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया जाता है जिसे ‘IHR इमरजेंसी कमेटी’ (IHR Emergency Committee) के नाम से जाना जाता है।
  • यह समिति WHO के महानिदेशक को आपातकाल लागू करने के मापदंडों पर सलाह देती है, जिन्हें अस्थायी सिफारिशों के रूप में जाना जाता है।
  • इन अस्थायी सिफारिशों में PHEIC की स्थिति वाले देशों द्वारा प्रयोग में लाए गए स्वास्थ्य देखभाल उपाय भी शामिल किये जाते हैं।
  • इस समिति की सिफारशों के आधार पर WHO महानिदेशक द्वारा PHEIC को लागू किया जाता है।

Hello दोस्तों मैं अनुज कुमार आज मै आपके लिए लेकर आया हूँ  बहुत interesting टॉपिक भूगोल 

पृथ्वी के प्रारंभिक वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड 

हाल ही में साइंस एडवांसेज़ (Science Advances) नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि पृथ्वी का प्रारंभिक वातावरण ऑक्सीजन से नहीं बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड से समृद्ध था।

मुख्य बिंदु:

  • यह अध्ययन लगभग 2.7 बिलियन वर्ष पहले पृथ्वी से टकराने वाले सूक्ष्म उल्का पिंडों के नमूनों के आधार पर किया गया है।
  • प्राचीन सूक्ष्म उल्का पिंडों में ऑक्सीकरण (Oxidation) की मात्रा बताती है कि हमारे ग्रह के शुरुआती वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा काफी ज़्यादा थी।
    • वर्तमान में पृथ्वी के वातावरण में नाइट्रोजन गैस की मात्रा सबसे ज़्यादा पाई जाती है।
  • शोधकर्त्ताओं ने बताया है कि ये सूक्ष्म उल्कापिंड वातावरण में सघन कार्बन डाइऑक्साइड वाले क्षेत्र से होकर गुज़रे थे। इसका मतलब है कि पृथ्वी पर शुरूआती समय में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक थी।
    • ये सूक्ष्म उल्कापिंड पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पिलबारा के चूना-पत्थर क्षेत्र में आर्कियन ईओन (Archean Eon) युग में गिरे थे जब सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल आज की अपेक्षा कमज़ोर था।

आर्कियन ईऑन (Archean Eon):

  • आर्कियन ईऑन, पृथ्वी के इतिहास के चार भूगर्भीय कालों में से एक है जो 4 से 2.5 बिलियन वर्ष पहले था।
  • आर्कियन ईऑन के दौरान पृथ्वी की ऊपरी परत काफी ठंडी हो गई थी जिससे महाद्वीपों के गठन की शुरुआत हुई और जीवन पनपने लगा था।

पूर्व में किये गए अध्ययन से संबंधित जानकारी:

  • पहले किये गए अध्ययन में बताया गया था कि उल्कापिंड यहाँ ऑक्सीजन से टकराए थे, लेकिन यह बात उन सिद्धांतों और सबूतों का खंडन करती है जो बताता है कि पृथ्वी का प्रारंभिक वातावरण वस्तुतः ऑक्सीजन से रहित था।
  • शोधकर्त्ताओं द्वारा वर्ष 2016 का एक शोधपत्र जो सूक्ष्म उल्का पिंडों की खोज के बारे में था, प्रकाशित किया गया था जिसमें बताया गया कि आर्कियन ईऑन के समय गिरे सूक्ष्म उल्का पिंडों में वायुमंडलीय ऑक्सीजन के सबूत मिले हैं।
  • नई व्याख्या हमारे ग्रह के शुरुआती दिनों की वर्तमान समझ को लेकर विरोधाभास उत्पन्न करती है जो ‘ग्रेट ऑक्सीकरण घटना’ (Great Oxidation Event) को भी गलत साबित कर सकती है।

ग्रेट ऑक्सीकरण घटना (Great Oxidation Event):

  • माना जाता है कि पृथ्वी के वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीजन की उपस्थिति के कारण ‘ग्रेट ऑक्सीकरण घटना’ हुई।
  • यह घटना ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाले साइनोबैक्टीरिया के कारण संभव हो सकी जो 2.3 अरब वर्ष पहले बहुकोशिकीय रूपों में थे।
    • साइनोबैक्टीरिया पृथ्वी पर सबसे पुराने जीवों से संबंधित है। ये जीव आज भी महासागरों और गर्म क्षेत्रों में मौजूद हैं। इन जीवों ने ऑक्सीजन का उत्पादन करके और बहुकोशिकीय रूपों में विकसित होकर साँस लेने वाले जीवों के उद्भव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्रों और वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीजन के स्तर में वृद्धि से कुछ ही समय पहले बहुकोशिकीयता (Multicellularity) विकसित हुई।
    • जीव विज्ञानी मानते हैं कि इस बहुकोशिकीयता (Multicellularity) का संबंध ऑक्सीजन की वृद्धि से था और इस प्रकार इनकी (साइनोबैक्टीरिया) वजह से पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत हुई।

पृथ्वी के वातावरण की उत्पत्ति को लेकर मतभेद: 

  • माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन 3.8 अरब वर्ष से भी अधिक पहले शुरू हुआ था किंतु पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत को लेकर शोधकर्त्ताओं में मतभेद है।
  • शोधकर्त्ता मानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कब हुई, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि वायुमंडल किससे बना था, क्या यह पहले से ही उपलब्ध था और यहाँ की जलवायु कैसी थी
  • वर्ष 2018 में हेलीयोन नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में यह बात भी सामने आई थी कि आज से तकरीबन 3.6 अरब वर्ष पहले पृथ्वी पर ऑक्सीजन का निर्माण होना शुरू हुआ था। जबकि अभी तक वैज्ञानिक यह मान रहे थे कि ऑक्सीजन का निर्माण करने वाले पहले सूक्ष्म जीव ‘साइनोबैक्टीरिया’ थे।
  • इस अध्ययन में बताया गया था कि इन सूक्ष्म जीवों से करीब एक अरब वर्ष पहले ही पृथ्वी पर ऑक्सीजन का निर्माण शुरू हो गया था।
Note : 
इस शोध के बाद पृथ्वी की प्रारंभिक स्थिति का पता लगाने से न केवल पृथ्वी के इतिहास को समझने में आसानी होगी बल्कि अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं की खोज में भी मदद मिल सकती है।

Thursday, January 30, 2020

शासन व्यवस्था 
कर्नाटकं का अंधविश्वास विरोधी अधिनियम 

  • कर्नाटक का अंधविश्वास विरोधी अधिनियम
  • भारत में अंधविश्वास संबंधी कुप्रथाएँ

Note :-

  • कर्नाटक सरकार ने 4 जनवरी, 2020 को औपचारिक रूप से ‘अमानवीय प्रथाओं तथा काला जादू की रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम, 2017, (Karnataka Prevention and Eradication of Inhuman Evil Practices and Black Magic Act, 2017) को अधिसूचित किया।

मुख्य बिंदु:

  • यह विवादास्पद अंधविश्वास विरोधी अधिनियम वर्ष 2017 में पारित किया गया था इसे 6 दिसंबर, 2017 को राज्यपाल की अनुमति प्राप्त हुई तथा वर्तमान सरकार द्वारा 4 जनवरी, 2020 को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया गया।
  • इस अधिनियम को राज्य के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित किया जा रहा है।

अधिनियम की पृष्ठभूमि:

  • इस अधिनियम को वर्ष 2013 में ‘कर्नाटक अंधविश्वास विरोधी विधेयक, 2013’ (Karnataka Anti Superstition Bill, 2013) के रूप में लाया गया था।
  • नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (National Law School of India University- NLSIU) के एक विशेषज्ञ पैनल ने सामाजिक बहिष्कार और समावेशी नीति पर अध्ययन करते हुए वर्ष 2013 में पहली बार इस कानून का मसौदा विधेयक पेश किया जिसमें एक दर्ज़न से अधिक अंधविश्वासों को रेखांकित किया गया।
  • हालाँकि मसौदे के सार्वजनिक होने के बाद कई विपक्षी दलों ने इसका धार्मिक आधार पर विरोध किया।
  • धार्मिक नेताओं और राजनीतिक दलों द्वारा विरोध किये गए शुरूआती मसौदे में निम्नलिखित प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाए गए थे-
    • पुजारियों को पालकी में ले जाना।
    • धर्मगुरुओं की चरण-वंदना करना।
    • मदे स्नान को रोकना।
    • वास्तु, ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान पर प्रतिबंध।

मदे स्नान

(Made Snana):

यह दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र में प्रचलित एक परंपरा है जहाँ श्रद्धालु अपनी मनौतियों को पूरा करने के लिये उच्च जातियों द्वारा खाए गए भोजन के अवशेषों पर लोटते हुए स्नान करते हैं।
  • वर्ष 2014 और 2016 में राज्य सरकार द्वारा लाए गए विधेयक के मसौदों को भी विरोध का सामना करना पड़ा।

वर्तमान अधिनियम:

  • अंततः वर्ष 2017 में राजनीतिक तौर पर सर्वसम्मति वाला एक विधेयक तैयार किया गया।
  • इस अधिनियम में धार्मिक स्थानों पर वास्तु, ज्योतिष, प्रदक्षिणा या पवित्र स्थानों की परिक्रमा संबंधी कार्यों को बाहर रखा गया है।
  • ‘मदे स्नान’ की प्रक्रिया को इस अधिनियम के तहत स्वैच्छिक कर दिया है तथा बचे हुए भोजन को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं करने के लिये इसे संशोधित किया गया है।
  • वर्ष 2017 के इस अधिनियम के तहत कुल 16 प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिनमें से कुछ प्रमुख प्रथाएँ निम्नलिखित हैं-
    • महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान पूजा घरों और घरों में उनकी आवाजाही पर प्रतिबंध लगाना।
    • लोगों को आग पर चलने के लिये मजबूर करना।
    • लोगों को दुष्ट घोषित करके उनकी पिटाई करना।

सज़ा का प्रावधान:

  • यह अधिनियम न्यूनतम एक वर्ष से अधिकतम सात वर्ष तक के कारावास तथा न्यूनतम पाँच हजार से अधिकतम पचास हजार रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान करता है।
  • इस कानून को राज्य पुलिस द्वारा पुलिस स्टेशनों में सतर्कता अधिकारियों की नियुक्ति के साथ लागू किया जाना है।

क्यों महत्त्वपूर्ण है यह अधिनियम?

  • कुछ लोगों का मत हो सकता है कि प्रस्तावित कानून संविधान के अनुच्छेद 25 (प्रत्येक व्यक्ति को अन्तःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप में मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार) का उल्लंघन करता है। हालाँकि इसे एक उचित प्रतिबंध के रूप में देखा जाना चाहिये, क्योंकि इससे सार्वजनिक हित सुनिश्चित होता है।
  • कर्नाटक में इस कानून को मज़बूती से लागू करने के लिये राज्य सरकार गंभीर है। कुप्रथाओं के उन्मूलन में कानूनी प्रावधानों की उपयोगिता अवश्य है, लेकिन समाज से अंधविश्वासों को जड़ से समाप्त करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिये हमें शिक्षा, तर्कसंगत सोच और वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देना होगा।

आगे के लिए पॉइंट :-

  • अल्पावधिक सुधारों के लिये हमें ऐसे कानूनों की आवश्यकता है जो इन कुरीतियों का अंत करने में सहायक हों।
  • कुप्रथाओं के दीर्घकालिक सुधार हेतु शिक्षा, तर्कसंगत सोच और वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देना होगा।
प्राचीनकाल से ही दुनिया भर में अंधविश्वास व्याप्त रहा है। अंधविश्वास एक तर्कहीन विश्वास है जिसका आधार अलौकिक प्रभावों की मनगढ़ंत व्याख्या है। इन अंधविश्वासों पर अधिकांश भारतीयों का अत्यधिक विश्वास है जो प्रायः आधारहीन होते हैं।
शासन व्यवस्था

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा ऑनलाइन सेवाओं की शुरुआत

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो
ई-शासन के संदर्भ में NCRB द्वारा शुरू की गई सेवाओं का महत्त्व

हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Record Bureau-NCRB) द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस के माध्यम से नागरिकों के लिये दो सेवाओं की शुरूआत की गई है।

मुख्य बिंदु:

  • इन दोनों सेवाओं को राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम (Crime and Criminal Tracking Network & Systems-CCTNS ) के माध्यम से संचालित किया जाएगा।
  • इन सेवाओं का मुख्य उद्देश्य लापता व्यक्तियों की खोज तथा वाहनों के लिये अनापत्ति प्रमाण पत्र (No Objection Certificate-NOC) प्राप्त करना है।

मिसिंग पर्सन सर्च’ और ‘जनरेट व्हीकल NOC सेवाएँ :

  • ‘मिसिंग पर्सन सर्च’ और ‘जनरेट व्हीकल NOC’ दोनों ही सेवाओं को लोगों द्वारा नागरिक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्राप्त किया जा सकेगा।
  • राज्यों में इस तरह की सेवाएँ पहले से ही राज्य नागरिक पोर्टल्स के माध्यम संचालित की जा रही हैं।
  • यह पहली बार है जब केंद्र द्वारा इस तरह की सवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर शरू किया गया है।
  • ये दोनों सेवाएँ नागरिकों को 'digitalpolicecitizenservices.gov.in' पोर्टल या फिर पहले से मौजूद 'डिजिटल पुलिस पोर्टल' की मदद से प्राप्त हो सकेगीं ।
  • मिसिंग पर्सन सर्च सेवा के तहत लोगों की खोज के लिये पोर्टल में ज़रूरी विवरण दिया जा सकता है जिसके बाद यह सिस्टम देश में मौजूदा राष्ट्रीय डेटाबेस के माध्यम से खोज का कार्य शरू करेगा तथा फोटो और अन्य विवरण के साथ संबंधित परिणाम के बारे में जानकारी प्रदान करेगा।
  • जनरेट व्हीकल NOC सेवा नागरिकों को अन्य व्यक्ति से वाहन खरीदते समय यह सुनिश्चित करने में मदद करेगी कि खरीदा गया वाहन पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है अथवा नहीं। यह जानकारी वाहन के विवरण के आधार पर राष्ट्रीय डेटाबेस में दर्ज की जा सकेगी।
  • वाहन के स्वामित्व के हस्तांतरण से पहले RTO के लिये आवश्यक प्रासंगिक NOC को कोई भी जनरेट और डाउनलोड कर सकता है।

Wednesday, January 29, 2020

विज्ञानं और प्रौद्योगिकी 


मिस्र की 3000 वर्ष पुरानी  ममी 

* 3-डी प्रिंटर, मिस्र की 3000 वर्ष पुरानी ममी
* ध्वनि संश्लेषण तकनीक से मानव जाति को लाभ, चिकित्सा क्षेत्र के तकनीकी आयाम

हाल ही में वैज्ञानिकों ने मिस्र के 3000 वर्ष पुराने प्राचीन मानव की आवाज़ को दोबारा सुनने में कामयाबी पाई है। ध्यातव्य है कि इन संरक्षित प्राचीन मानवों/शवों को ममी (Mummy) कहा जाता है।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • वैज्ञानिकों ने ध्वनि संश्लेषण तकनीक के माध्यम से नेस्यामूं के ममी की आवाज़ की पुनरोत्पत्ति की है।
  • ध्यातव्य है कि वैज्ञानिकों ने CT-Scan, 3D प्रिंटिंग तकनीक और एक इलेक्ट्रॉनिक स्वरयंत्र (Larynx) का उपयोग करके स्वर तंत्र (Vocal Tract) के पुनर्निर्माण द्वारा 3,000 साल पुरानी मिस्र की ममी की आवाज़ की नकल तैयार की है।

3000 वर्ष पुरानी ममी के बारे में

  • 3000 वर्षीय मिस्र की ममी का नाम नेस्यामूं (Nesyamun) था। ध्यातव्य है कि यह नाम उसके ताबूत के शिलालेख के अनुसार है।
  • ऐसा माना जाता है कि नेस्यामूं रामसेस XI के शासन के दौरान का था। उस दौरान वह थेब्स में एक मुंशी या पुजारी के रूप में काम करता था।
  • यह पहली बार नहीं है जब नेस्यामूं एक वैज्ञानिक अध्ययन का विषय बना है। वर्ष 1824 में उसके शरीर के आवरण को खोलने (Unwrapped) के बाद इसकी जाँच लीड्स फिलोसोफिकल एंड लिटरेरी सोसाइटी (Leeds Philosophical and Literary Society) के सदस्यों द्वारा की गई थी।
  • इस पर कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने भी अध्ययन किया था जिसमें पता चला था कि नेस्यामूं की मृत्यु 50 के दशक के मध्य में हुई थी और वह मसूड़ों की बीमारी तथा गंभीर रूप से खराब दाँतों से पीड़ित था।

वैज्ञानिकों ने ममी की आवाज़ की पुनरोत्पत्ति कैसे की?

  • पुनः प्राप्त ध्वनि स्वर-जैसी (Vowel-like) है और ममी के मौजूदा स्वर तंत्र (Vocal Tract) के सटीक मापों के आधार पर 3D स्वर तंत्र का निर्माण करके इस ध्वनि को पुनः प्राप्त किया गया है। ध्यातव्य है कि स्वर तंत्र की माप ममी का कंप्यूटरीकृत टोमोग्राफी स्कैन (Computerised Tomography Scan- CT Scan) करके की है।
  • शोधकर्त्ताओं ने 3 डी प्रिंटर का उपयोग करके ममी के स्वर तंत्र के त्रि-आयामी मॉडल का निर्माण किया और इसे एक इलेक्ट्रॉनिक स्वरयंत्र (Larynx) से जोड़कर ध्वनि की पुनरोत्पत्ति की।
  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, सटीक ध्वनि की उत्पत्ति के लिये स्वर तंत्र के नरम ऊतकों के सही संरक्षण की आवश्यकता होती है, जो उन व्यक्तियों में असंभव है जिनके अवशेष केवल कंकाल रूप में हैं।
  • यह प्रक्रिया केवल तभी संभव है जब प्रासंगिक स्वर तंत्र के नरम ऊतक यथोचित रूप से बरकरार रहें। गौरतलब है कि मिस्र के पुजारी नेस्यामूं के 3,000 साल पुराने शरीर में ये ऊतक सुरक्षित थे।

ध्वनि की पुनरोत्पत्ति का महत्त्व:

  • इस ध्वनि संश्लेषण तकनीक के प्रयोग से वर्तमान समय में किसी अघात या अन्य कारणों से अपनी आवाज़ गँवा चुके लोगों को पुनः आवाज़ प्रदान की जा सकती है।
  • इसके विस्तार से वैश्विक चिकित्सा पद्धति एवं चिकित्सा क्षेत्र में आमूलचूल सकारात्मक परिवर्तन होने की उम्मीद है।

विविध 

Rapid Fire: 28 जनवरी, 2020

गति (GATI) पोर्टल

हाल ही में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ऑनलाइन वेब पोर्टल ‘गति’ (GATI) की शुरुआत की है। इसे प्रधानमंत्री कार्यालय (Prime Minister Office-PMO) द्वारा प्रयोग किये जा रहे ‘प्रगति’ (PRAGATI) पोर्टल से प्रेरणा लेने के बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (National Highways Authority of India- NHAI) द्वारा तैयार किया गया है। इस पोर्टल के माध्यम से न केवल राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण कार्यों में पारदर्शिता आएगी बल्कि निर्माण कार्य को बढ़ावा देने के निर्णय को भी गति मिलेगी। अधिकारियों के अनुसार, इस पोर्टल की निगरानी NHAI के अधिकारियों की एक टीम द्वारा की जाएगी। इस पोर्टल पर दर्ज शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।

लाला लाजपत राय

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रखर नेता लाला लाजपत राय (Lala Lajpat Rai) की 28 जनवरी को जयंती मनाई जाती है। लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को फिरोज़पुर ज़िले के ढुडिके गांव में हुआ था। किशोरावस्था में वे स्वामी दयानंद सरस्वती (Dayananda Saraswati) से मिले और आर्य समाजी विचारों से काफी ज़्यादा प्रेरित हुए। लाला लाजपत राय ने स्वतंत्रता संघर्ष में कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व भी किया। जब साइमन कमीशन भारत आया तो लाला जी ने इसके विरोध में लाहौर में आयोजित बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया। इस आंदोलन में अंग्रेजों ने जनता पर लाठियाँ बरसाई जिनकी चपेट में आने से 17 नवंबर, 1928 को लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गई।

ग्रैमी अवॉर्ड्स

62वें ग्रैमी अवॉर्ड्स की घोषणा कर दी गई है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा को उनके बेस्ट सेलर संस्मरण 'बीकमिंग' (Becoming) के लिये ग्रैमी अवॉर्ड दिया गया। 'बीकमिंग' एक ऑडियोबुक है जिसे मिशेल ओबामा ने ही आवाज़ दी है। इसके अलावा युवा अमेरिकन पॉप सिंगर बिली एलिश ने पहली बार 5 ग्रैमी अवॉर्ड जीते। बिली इस वर्ष अवॉर्ड जीतने वाली (18 साल) सबसे युवा सिंगर हैं। सिंगर लेडी गागा ने भी दो अवॉर्ड जीतकर अपने कॅरियर के कुल 11 ग्रैमी अवार्ड पूरे कर लिये हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी


A-SAT एवं ADTCR


    अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की सामरिक शक्ति, भारत का सॉफ्ट एवं हार्ड पॉवर
    Main point :-
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (Defence Reserch and Development Organisation- DRDO) ने 71वें गणतंत्र दिवस परेड के दौरान अपनी एंटी-सैटेलाइट (Anti-Satellite) मिसाइल और वायु रक्षा सामरिक नियंत्रण रडार (Air Defence Tactical Control Radar- ADTCR) का प्रदर्शन किया।

71वें गणतंत्र दिवस से संबंधित मुख्य बातें

  • 71वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो (Jair Bolsonaro) को आमंत्रित किया गया था।
  • भारतीय वायु सेना के चिनूक हेलीकॉप्टर और अपाचे हेलीकॉप्टर ने गणतंत्र दिवस पर फ्लाईपास्ट (Flypast) में पहली बार भाग लिया।
  • इसके अलावा सेना ने अपने 155 मिमी. धनुष और हॉवित्जर तोप एवं K9-वज्र स्व-चालित तोपखाने का प्रदर्शन किया।
  • यह पहला अवसर था जब चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) सहित चार सैन्य अधिकारी गणतंत्र दिवस समारोह/परेड में शामिल रहे।
  • गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार सेना की मार्चिंग टुकड़ियों के बीच कोर ऑफ आर्मी एयर डिफेंस की एक टुकड़ी भी थी।
  • ध्यातव्य है कि सेना की सिग्नल कोर टुकड़ी का नेतृत्व चौथी पीढ़ी की अधिकारी कैप्टन तान्या शेरगिल ने किया।

A-SAT मिसाइल के बारे में

  • यह एक इंटरसेप्टर मिसाइल है जो अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट या जाम कर देती है।
  • A-SAT मिसाइल मुख्यतः दो प्रकार की हैं:
    • काइनेटिक ए-सैट (Kinetic A-SAT):बैलिस्टिक मिसाइलों की भाँति यह किसी उपग्रह को नष्ट करने के लिये प्रत्यक्ष रूप से उस पर प्रहार करता है।
    • नॉन-काइनेटिक ए-सैट (Non-Kinetic A-SAT):गैर-काइनेटिक ए-सैट वे हैं जो अंतरिक्ष में वस्तुओं को अप्रत्यक्ष रूप से निष्क्रिय या नष्ट करते हैं, इसमें आवृत्ति जैमिंग (Frequency Jamming), ब्लाइंडिंग लेजर (Blinding Lasers) या साइबर-हमले शामिल हैं।
  • ध्यातव्य है कि इस मिसाइल का परीक्षण मार्च 2019 में मिशन शक्ति (Mission Shakti) के अंतर्गत किया गया था।

वायु रक्षा सामरिक नियंत्रण रडार (ADTCR) के बारे में

  • ADTCR का उपयोग वॉल्यूमेट्रिक सर्विलांस (Volumetric Surveillance), ​​डिटेक्शन (Ditection), ट्रैकिंग और विभिन्न प्रकार के हवाई लक्ष्यों (मित्र/दुश्मन) की पहचान और कई कमांड पोस्ट तथा हथियार प्रणालियों के लिये प्राथमिकता वाले टारगेट डेटा के प्रसारण हेतु किया जाता है।
  • यह बहुत छोटे लक्ष्यों और कम उड़ान वाले लक्ष्यों का पता लगाने में भी सक्षम है।

गणतंत्र दिवस परेड के मायने

  • गणतंत्र दिवस परेड के माध्यम से भारत विश्व के समक्ष अपनी सांस्कृतिक विविधता, सामरिक शक्ति, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार और गणतांत्रिक तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रदर्शित करता है।
  • ध्यातव्य है कि परेड में शामिल राज्यों की झांकियाँ भारत की संस्कृति, सांस्कृतिक विविधता एवं सॉफ्ट पॉवर को प्रदर्शित करती हैं तथा सैन्य टुकड़ियाँ एवं हथियारों के प्रदर्शन का उद्देश्य भारत की सामरिक शक्ति एवं हार्ड पॉवर को सबके समक्ष (देशवासियों एवं अन्य राष्ट्रों) प्रदर्शित करना है।
  • A-SAT मिसाइल, ADTCR, चिनूक हेलीकॉप्टर, अपाचे हेलीकॉप्टर सहित अन्य सैन्य उपकरणों का प्रदर्शन भारत को वैश्विक पटल पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में प्रदर्शित करेगा।